Haryana News: हरियाणा के वरिष्ठ आई.ए.एस. (IAS) अधिकारी प्रदीप कुमार ने अपने खिलाफ केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) द्वारा की गई कार्रवाई को पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट में चुनौती देकर एक नया कानूनी विवाद खड़ा कर दिया है। सरकारी विभागों के बैंक खातों से धन के कथित गबन और अनधिकृत ट्रांसफर के संगीन मामले में गिरफ्तार प्रदीप कुमार ने अपनी गिरफ्तारी की प्रक्रिया, पुलिस रिमांड और वर्तमान न्यायिक हिरासत को अवैध बताते हुए याचिका दायर की है। उन्होंने न केवल इस कार्रवाई के पीछे की मंशा पर उंगली उठाई है, बल्कि अदालत से अपनी तत्काल रिहाई की गुहार भी लगाई है।
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मौलिक और संवैधानिक अधिकारों के हनन का आरोप
आईएएस प्रदीप कुमार की याचिका का सबसे पहला और मजबूत आधार कानूनी प्रक्रिया का पालन न करना है। याचिका के अनुसार, सीबीआई ने उन्हें हिरासत में लेते समय या उसके बाद भी गिरफ्तारी के ठोस आधार लिखित रूप में उपलब्ध नहीं कराए।
उनके वकीलों ने कोर्ट में दलील दी है:
संवैधानिक मर्यादा का उल्लंघन: भारतीय संविधान के तहत किसी भी व्यक्ति को उसकी गिरफ्तारी के कारणों की लिखित जानकारी दिए बिना कस्टडी में रखना उसके बुनियादी मौलिक अधिकारों का सीधा हनन है।
पूरी प्रक्रिया को रद्द करने की मांग: याचिका में स्पष्ट कहा गया है कि यदि किसी गिरफ्तारी की बुनियादी शुरुआत ही गैर-कानूनी और वैधानिक नियमों के खिलाफ हो, तो उसके बाद की गई रिमांड और न्यायिक हिरासत की पूरी कानूनी इमारत स्वतः ही ढह जाती है। इसलिए, इस पूरी दोषपूर्ण कार्रवाई को तुरंत निरस्त किया जाना चाहिए।
गिरफ्तारी की ‘टाइमिंग’ में भारी गड़बड़ी
याचिका का दूसरा सबसे तकनीकी और संवेदनशील पहलू गिरफ्तारी के समय (टाइमिंग) में पाई गई विसंगति है। प्रदीप कुमार के कानूनी पक्ष ने सीबीआई द्वारा तैयार किए गए दस्तावेजों को अदालत के समक्ष रखते हुए जांच एजेंसी की कार्यप्रणाली पर गंभीर शक जताया है:
पत्नी को भेजी गई सूचना: प्रदीप कुमार की गिरफ्तारी के बाद जब नियमतः उनकी पत्नी को इसकी सूचना दी गई, तो उस आधिकारिक पत्र में गिरफ्तारी का समय शाम 4:25 बजे दर्ज किया गया था।
आधिकारिक अरेस्ट मेमो: इसके विपरीत, जांच एजेंसी द्वारा तैयार किए गए मुख्य अरेस्ट मेमो (Arrest Memo) में उनकी गिरफ्तारी का समय शाम 6:25 बजे अंकित किया गया है।
आईएएस अधिकारी का दावा है कि दो घंटे का यह स्पष्ट अंतर महज कोई क्लैरिकल गलती या मानवीय भूल नहीं हो सकता। यह सीधे तौर पर इस बात का संकेत है कि कानूनी औपचारिकताओं को कागजों पर सही दिखाने के लिए दस्तावेजों के साथ हेरफेर की गई है, जिससे पूरी जांच की निष्पक्षता पर सवाल खड़ा होता है।
एंटी-करप्शन ब्यूरो से सीबीआई तक पहुंचा मामला
इस हाई-प्रोफाइल मामले की शुरुआत सबसे पहले हरियाणा एंटी-करप्शन ब्यूरो (ACB) की एफआईआर के साथ हुई थी। मामले की गहराई और बैंकिंग गबन के बड़े नेटवर्क को देखते हुए बाद में इसकी कमान देश की शीर्ष जांच एजेंसी सीबीआई को सौंप दी गई थी।
प्रदीप कुमार का कहना है कि वह जांच में शुरू से ही पूरा सहयोग कर रहे थे, लेकिन इसके बावजूद 30 जून को नरवाना टोल प्लाजा से उन्हें अचानक हिरासत में ले लिया गया। इस पूरे मामले को गंभीरता से लेते हुए पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने सीबीआई से इस पूरी कार्रवाई और समय की विसंगति पर लिखित जवाब तलब किया है। अदालत ने इस मामले की अगली सुनवाई 15 सितंबर को तय की है, जहां सीबीआई को इन सभी गंभीर आरोपों पर अपना पक्ष साबित करना होगा।
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