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Haryana News: अनिल विज की पहल का असर, अधिकारियों के साथ होगी निर्णायक बैठक

हरियाणा की आगामी कैबिनेट बैठक से पहले अम्बाला छावनी की फ्री होल्ड संपत्तियों की नीति को लेकर हलचल तेज हो गई है।

Haryana News

Wrriten By :

Nivedita Kasaudhan

Published On :

अगस्त 10, 2026

Haryana News: हरियाणा सरकार की आगामी 13 अगस्त को प्रस्तावित महत्वपूर्ण कैबिनेट बैठक से ठीक पहले, अम्बाला छावनी की फ्री होल्ड संपत्तियों से जुड़ी नीति पर राजनीतिक और प्रशासनिक गलियारों में हलचल काफी तेज हो गई है। ऊर्जा, परिवहन एवं श्रम मंत्री अनिल विज ने इस नीति की प्रस्तावित और पेचीदा शर्तों पर गंभीर आपत्तियां दर्ज कराई हैं, जिसके चलते इसे लेकर प्रशासनिक स्तर पर मंथन शुरू हो गया है। पिछली कैबिनेट बैठक में इस नीति का मसौदा पेश करने वाले वरिष्ठ अधिकारियों के साथ मंत्री अनिल विज की एक अहम बैठक चंडीगढ़ स्थित हरियाणा सचिवालय में होनी तय हुई है।

इस उच्चस्तरीय बैठक का मुख्य उद्देश्य उन सभी कठोर शर्तों पर विस्तार से चर्चा करना है, जिन्हें लेकर अम्बाला छावनी के हजारों नागरिकों में भारी असंतोष और चिंता का माहौल है। मंत्री विज का यह कड़ा रुख स्पष्ट करता है कि फ्री होल्ड नीति ऐसी होनी चाहिए जिससे दशकों से अपनी ही संपत्तियों के स्थायी मालिकाना हक के लिए संघर्ष कर रहे आम और मध्यम वर्गीय परिवारों को वास्तविक एवं व्यावहारिक राहत मिल सके।

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क्या है 1977 के समझौते का पूरा ऐतिहासिक घटनाक्रम?

इस पूरे विवाद और संपत्ति के पेचीदगियों से भरे इतिहास को सामने लाते हुए अनिल विज ने बताया कि 5 फरवरी 1977 तक अम्बाला छावनी का संपूर्ण क्षेत्र छावनी बोर्ड (केंटोनमेंट बोर्ड) के प्रशासनिक नियंत्रण के अधीन आता था। उस समय के तत्कालीन रक्षा मंत्री बंसीलाल के कार्यकाल में लगभग 1063 एकड़ भूमि को छावनी क्षेत्र से पृथक करके नगर पालिका को हस्तांतरित किया गया था। इस तय समझौते के अनुसार, हरियाणा सरकार को भारत सरकार की इस जमीन का पूर्ण मालिकाना हक मिलना था और इसके एवज में भारतीय सेना को 150 एकड़ भूमि निःशुल्क उपलब्ध कराई जानी थी।

विज के अनुसार, लंबे समय तक प्रशासनिक सुस्ती के कारण इस समझौते पर सही तरीके से अमल नहीं हो सका। वर्ष 2000 तक किसी भी पूर्ववर्ती सरकार ने इस दिशा में कोई ठोस कदम नहीं उठाया, लेकिन उनके अपने निरंतर और विशेष प्रयासों के माध्यम से सेना को जमीन दिलाकर इस समझौते को पूरी तरह अमलीजामा पहनाया गया। हालांकि, इसके बाद संपत्तियों की रजिस्ट्री व्यवस्था में एक बड़ा बदलाव आया, जहां पूर्ण भू-स्वामित्व के स्थान पर केवल भवन की रजिस्ट्री होने लगी और जमीन का मालिकाना हक सरकार के नाम दर्ज होने लगा। यही विसंगति आगे चलकर अम्बाला के संपत्ति मालिकों के लिए सबसे बड़ी परेशानी का सबब बन गई।

प्रस्तावित नीति की शर्तें और अनिल विज की कड़ी आपत्तियां

अनिल विज ने स्थानीय अधिवक्ताओं और विषय विशेषज्ञों के साथ मिलकर इस नई फ्री होल्ड नीति का गहराई से अध्ययन किया है और इसके कई प्रमुख प्रावधानों पर कड़ी आपत्ति जताई है:

कलेक्टर रेट के आधार पर भारी-भरकम भुगतान: नीति के तहत पूरी जमीन का मूल्य मौजूदा कलेक्टर रेट के हिसाब से वसूलने का प्रस्ताव है। विज का तर्क है कि यदि किसी नागरिक के पास 1000 गज जमीन है और वहां का कलेक्टर रेट 60 हजार रुपये प्रति गज है, तो कुल देय राशि करोड़ रुपये में पहुंच जाएगी, जिसे आम और मध्यम वर्गीय परिवार चुकाने में पूरी तरह असमर्थ हैं।

कठोर और अव्यवहारिक भुगतान नियम: आवेदन के समय ही कुल राशि का 25 प्रतिशत हिस्सा तुरंत और शेष 75 प्रतिशत राशि मात्र एक वर्ष की अल्प अवधि के भीतर जमा करने की शर्त रखी गई है। समयावधि में भुगतान न होने पर संपत्ति को सील करने और सरकार द्वारा उसे अपने कब्जे में लेने का प्रावधान है, जिसका कड़ा विरोध किया जा रहा है।

150 साल पुराने मूल दस्तावेजों की मांग: नीति में फ्री होल्ड का अधिकार प्राप्त करने के लिए 150 वर्ष पुराने मूल दस्तावेज प्रस्तुत करने की शर्त जोड़ी गई है, जो वर्तमान समय में अधिकांश परिवारों के पास होना व्यावहारिक रूप से असंभव है। विज ने मांग की है कि पुराने दस्तावेजों के अभाव में बिजली बिल, पानी का बिल और प्रॉपर्टी टैक्स रसीद जैसे वैकल्पिक सरकारी दस्तावेजों को वैध प्रमाण माना जाए।

कैबिनेट में एजेंडा स्थगित और जनहित के पक्ष में कड़ा रुख

अनिल विज ने स्पष्ट किया कि जब यह फ्री होल्ड नीति का एजेंडा कैबिनेट के समक्ष लाया गया था, तो उन्होंने मुख्यमंत्री के सामने इस बात पर कड़ी नाराजगी जताई थी कि सात बार के विधायक होने के बावजूद इस बेहद महत्वपूर्ण नीति को तैयार करते समय उनसे किसी प्रकार की सलाह या चर्चा तक नहीं की गई। उनकी इस मुखर आपत्ति के बाद ही इस एजेंडे को फिलहाल स्थगित (डिफर) कर दिया गया था।

अपने राजनीतिक रुख को पूरी तरह स्पष्ट करते हुए अनिल विज ने दो टूक शब्दों में कहा है कि उनकी पहली प्राथमिकता सरकार के भीतर ही संवाद स्थापित कर इस नीति में जनहितैषी और व्यावहारिक बदलाव कराना है। हालांकि, यदि जनता की न्यायसंगत मांगों को नजरअंदाज किया गया, तो वह पूरी दृढ़ता के साथ अम्बाला की जनता के हक में खड़े नजर आएंगे। अब तमाम निगाहें 11 अगस्त को होने वाली इस उच्चस्तरीय प्रशासनिक बैठक और 13 अगस्त की कैबिनेट बैठक पर टिकी हैं, जहां यह तय होगा कि अम्बाला छावनी के हजारों परिवारों को इस नीति से वास्तविक राहत मिलती है या नहीं।

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